क्रोध को करुणा में बदलना ही सबसे बड़ी बहादुरी है – विकास कुमार – Shivam Mail

क्रोध को करुणा में बदलना ही सबसे बड़ी बहादुरी है – विकास कुमार

उत्तराखंड(देहरादून),शुक्रवार 01 मई 2026

“मैंने अपना लोभ, ईर्ष्या एवं क्रोध खाया”—यह पंक्ति केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि आत्म-रूपांतरण का एक महाकाव्य है। सामान्यतः हम भोजन से शरीर को पोषण देते हैं, लेकिन जब कोई साधक अपने नकारात्मक विकारों को ‘खाने’ की बात करता है, तो इसका अर्थ उनका दमन नहीं, बल्कि उनका विवेक की अग्नि में ‘पाचन’ और रूपांतरण है। यह स्वयं से स्वयं की जंग है, जहाँ हारने वाला भी अंततः विजेता बनता है।

लोभ का अंत: बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ और संतोष
लोभ एक अंतहीन गड्ढा है। गौतम बुद्ध के दर्शन में इसे ‘तृष्णा’ कहा गया है। जब हम कहते हैं कि “मैंने अपना लोभ खा लिया”, तो हम अनासक्ति के सिद्धांत को अपनाते हैं। सम्राट अशोक का उदाहरण यहाँ सटीक बैठता है। कलिंग युद्ध तक अशोक का लोभ साम्राज्य विस्तार की सीमाओं को लांघ रहा था, लेकिन बुद्ध के मार्ग पर चलते ही उन्होंने उस लोभ को ‘पचा’ लिया और ‘भेरीघोष’ को ‘धम्मघोष’ में बदल दिया। लोभ को खाना दरअसल यह समझना है कि संसार अनित्य है और सच्चा संचय वस्तुओं का नहीं, बल्कि सद्गुणों का होता है।

ईर्ष्या का रूपांतरण: शिव का विषपान और प्रेरणा
ईर्ष्या वह विष है जो मनुष्य को भीतर ही भीतर खोखला करता है। भारतीय दर्शन में भगवान शिव का हलाहल विष पीना इसी का प्रतीक है। शिव ने विष को न उगला, न निगला, बल्कि कंठ में धारण कर लिया। इसी प्रकार, जब हम अपनी ईर्ष्या को ‘खाते’ हैं, तो हम दूसरों की सफलता से जलने के बजाय उसे ‘प्रेरणा’ बना लेते हैं। मनोवैज्ञानिक अब्राहम मास्लो के ‘आत्म-सिद्धि’ के सिद्धांत के अनुसार, एक श्रेष्ठ व्यक्ति वह है जिसकी प्रतिस्पर्धा दूसरों से नहीं, बल्कि स्वयं के पुराने संस्करण से होती है। ईर्ष्या जब पच जाती है, तो वह आत्म-सुधार की ऊर्जा बन जाती है।

क्रोध का शमन: करुणा की पराकाष्ठा , क्रोध विवेक का सूर्य अस्त कर देता है। क्रोध को ‘खाने’ का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि असीम मानसिक शक्ति है। महात्मा गांधी ने अपने भीतर के क्रोध को ‘खाकर’ ही उसे अहिंसा की वैश्विक शक्ति में बदला था। उन्होंने सिखाया कि क्रोध को यदि रचनात्मक रूप दिया जाए, तो वह समाज बदल सकता है। जब हम अपने क्रोध को पचाते हैं, तो वह ‘करुणा’ और ‘धैर्य’ में रूपांतरित हो जाता है। यह प्रतिक्रिया के स्थान पर विवेकपूर्ण उत्तर देने की कला है।

आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहाँ ‘चूहा दौड़’ ने मनुष्य को इन तीन विकारों का दास बना दिया है, यह विचार और भी प्रासंगिक हो जाता है। अपने विकारों को खाना दरअसल अपने अहंकार का विसर्जन करना है। जब मनुष्य अपने लोभ, ईर्ष्या और क्रोध को आत्मसात कर लेता है, तो उसके भीतर एक ऐसी शांति का जन्म होता है जिसे संसार की कोई भी बाहरी शक्ति भंग नहीं कर सकती।

“कल तक मैं दुनिया जीतना चाहता था इसलिए मैं लोभ में था, आज मैंने खुद को जीत लिया है क्योंकि मैंने अपने लोभ, ईर्ष्या और क्रोध को खा लिया है।”

(लेख के कुछ अंश को बुद्ध द्वारा दिए गए सूत्रों से लिया गया है।)

(लेखक विकास कुमार एक जनसंपर्क पेशेवर हैं, जिन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जनसंपर्क के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव प्राप्त है। वे ‘पब्लिक रिलेशंस काउंसिल ऑफ इंडिया’-पीआरसीआई उत्तरी भारत के संयुक्त सचिव और पीआरसीआई देहरादून चैप्टर के सचिव हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *